फ़र्रूख़ाबाद

गाडगे यूथ ब्रिगेड फर्रुखाबाद ने धूमधाम से मनाया 76व स्वतंत्रता दिवस

गाडगे यूथ ब्रिगेड के जिला अध्यक्ष मनीराम माथुर व जिला प्रभारी दुर्गेश कनौजिया ने की अध्यक्षता

ब्यूरो रिपोर्ट फर्रुखाबाद

गाडगे यूथ ब्रिगेड फर्रुखाबाद ने धूमधाम से मनाया 76व स्वतंत्रता दिवस
गाडगे यूथ ब्रिगेड के जिला अध्यक्ष मनीराम माथुर व जिला प्रभारी दुर्गेश कनौजिया ने की अध्यक्षता
सबसे पहले जिला अध्यक्ष मनीराम माथुर जी ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि

जब स्वतंत्रता की बात की जाती है, तो आम आदमी के लिए इसके क्या मायने हैं? आखिर स्वतंत्रता क्या है? आम आदमी के लिए आज़ादी का कोई मूल्य नहीं है, यदि समाज में बराबरी, भाईचारा, न्याय, सांप्रदायिक सद्भाव और शांति नहीं है।

संत गाडगे महाराज समिति के द्वारा मनाया जा रहा स्वतंत्रता दिवस

 

भारत का इतिहास चन्द्रगुप्त मौर्य और बिंबसार से शुरु होकर, ई0 पू0 321 से लेकर ई0 पू0 185 तक मौर्य साम्राज्य और ई0 पू0 185 से ई0 पू0 30 तक की अवधि को छोड़ दें, तो शूद्रों का ही शासन रहा है, और इन शूद्र राजाओं के सलाहकार और महा मंत्री अधिकतर ब्राह्मण ही रहे हैं। मुस्लिम शासन काल में भी ब्राह्मणों तथा अन्य कथित उच्च जातियों के संभ्रांत वर्ग के लोगों को उपयुक्त प्रतिनिधित्व मिलता रहा है। अंग्रेजों की हुकूमत में भी भारत की कथित उच्च जातियों को प्रमुख ओहदों पर आसीन होने के अवसर मिलते रहे थे। फिर प्रश्न पैदा होता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि अंग्रेजी हुकूमत से निजात पाने के लिए आंदोलन का बिगुल फूंकना पड़ा? भारत में एक लंबे काल खंड तक विदेशी मुस्लिमों का शासन रहा, लेकिन देश से उन्हें खदेड़ने के लिए आखिर कोई मुहिम क्यों नहीं चलाई गई? कारण स्पष्ट है कि मुगलों के शासन काल में ब्राह्मणवादी वर्ण व्यवस्था को कोई हानि नहीं पहुंचाई गई, हिन्दू रीति रिवाजों और कुरीतियों से कोई छेड़खानी नहीं की गई, और कथित उच्च जातियों के संभ्रांत वर्ग को बराबरी और सम्मान भी दिया गया। लेकिन अंग्रेजों और उनके प्रशासन ने मनुवादी व्यवस्था से छेड़खानी शुरू कर दी, हिन्दू कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किया और सदियों से हाशिए पर पड़े वंचित और शोषित वर्ग को भी पढ़ने का अधिकार दिया, यही नहीं उन्हें वयस्क मताधिकार भी प्रदान किया। बस, यही बातें भारतीय समाज के उच्च वर्ग को मंजूर नहीं थीं, वे किसी भी हालत में शूद्रों और अंत्यजों को कोई अधिकार देने के खिलाफ थे और उन्हें अपनी दासता से मुक्त होने देना नहीं चाहते थे। डॉक्टर अम्बेडकर कहते थे, कि “एम के गांधी और उनकी कांग्रेस उन लोगों के लिए आजादी चाहते हैं जो अंग्रेजों के गुलाम थे और मैं उन लोगों की आजादी चाहता हूं जो गुलामों के भी गुलाम हैं। इसलिए जब तक समाज के एक बहुत बड़े शोषित तबके को शोषक वर्ग के शोषण से मुक्ति नहीं मिल जाती है, आजादी के कोई मायने नहीं हैं।”

एक ओर जहां परोक्ष रूप से भारत के प्रभुत्व संपन्न वर्ग को सत्ता हस्तांतरण के लिए स्वतंत्रता प्राप्ति की लड़ाई एम0 के 0 गांधी के नेतृत्व में लड़ी जा रही थी, वहीं दूसरी ओर, डॉक्टर अंबेडकर भारत के एक बहुसंख्यक शोषित समाज की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ रहे थे। उनका मानना था कि स्वतंत्र भारत में सभी को समान अवसर और अधिकार मिलने चाहिए। इसीलिए वे सर्वप्रथम इस बहुसंख्यक समाज के लिए अंग्रेजों से उनके अधिकार सुरक्षित कर लेना चाहते थे, वे शूद्रों और अंत्यजों को कथित उच्च जातियों की दासता से मुक्त कराना चाहते थे। वे नहीं चाहते थे कि भारत को आजादी मिले और इस बहुसंख्यक वर्ग को खजूर से उतारकर बबूल पर टांग दिया जाए।

गाडगे यूथ ब्रिगेड के जिला प्रभारी दुर्गेश कनौजिया जी का मानना है कि

अंबेडकर, अन्य नेताओं की तरह ऐसे नेता नहीं थे जो किसी नेता के पिछलग्गू बनकर घूमते फिरें, लोगों को इकट्ठा करें, मीटिंग करें या नियमित रूप से धरना प्रदर्शन करें। वे विश्व के बहुत ही शिक्षित व्यक्ति थे, और वे जानते थे कि उन्हें अपने समाज के लिए और भारत के लिए बहुत कुछ करना है। कई एक नेताओं ने विदेश में शिक्षा ग्रहण की लेकिन उन्होंने जो अध्ययन किया उसका कभी समाज के हित के लिए उपयोग नहीं किया। कुछ नेता तो विदेश में पढ़े और परीक्षाओं में असफल भी हो गए लेकिन भारत में आकर उन्होंने सिर्फ लोगों को इकट्ठा किया, सभाएं की और धरना प्रदर्शन किया। इस काम को तो अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोग भी कर सकते हैं। बहुत सारे ऐसे नेता हुए हैं, जिनमें उन पढ़े लिखे नेताओं से कोई कम क्षमता नहीं थी। लेकिन जो काम एक उच्च शिक्षित व्यक्ति कर सकता था, वह डॉ० अंबेडकर ने किया, जिसे कोई और नहीं कर सकता था। आम आदमी बाबा साहेब अंबेडकर की उच्च शिक्षा के स्तर को नहीं समझ पाता है, इसलिए वह उनके उन महान कार्यों से अनभिज्ञ रहता है, जो उन्होंने भारत के लिए किए।

राहुल कनौजिया गाडगे यूथ ब्रिगेड मीडिया प्रभारी जीने अंबेडकर जी की कार्य शैली पर प्रकाश डालते हुए कहा कि

सन् 1955 में, बाबा साहेब अंबेडकर ने भारत सरकार को सुझाव दिया कि मध्यप्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों को विभक्त कर दिया जाए, क्योंकि उनका मानना था कि छोटे राज्यों को अच्छी तरह से प्रशासित और विकसित किया जा सकता है। उस समय उनके सुझावों पर गौर नहीं किया गया और उनके मरणोपरांत सन 2000 में छत्तीस गढ़ और झारखंड राज्यों का गठन किया गया, और बाद में यूपी को भी दो भागों में बांट दिया गया और उत्तराखंड एक नया राज्य गठित कर दिया गया। डॉ 0 अंबेडकर ने ‘आरबीआई’ की स्थापना में भी प्रमुख भूमिका निभाई। डा 0 अंबेडकर की पुस्तक, ‘ प्रॉब्लम ऑफ द रूपी – इट्स ओरिजन एंड इट्स सॉल्यूशन ‘ की गाइडलाइंस के तहत इसका गठन किया गया। सातवें भारतीय श्रम सम्मेलन में अंबेडकर ने मजदूरों के 14 घंटे काम करने के समय को घटाकर 8 घंटे कर दिया ताकि उनका शोषण रोका जा सके। डा0 अंबेडकर की आत्मकथा, ‘ वेटिंग फॉर वीसा ‘ जिसे उन्होंने 1935 – 36 में लिखा था, कोलंबिया विश्वविद्यालय में एक टैक्स्ट बुक के रूप में विद्यार्थियों को पढ़ाया जाता है। बाबा साहेब अंबेडकर ने भारत में रोजगार नियोजन कार्यालयों का गठन किया ताकि लोगों को रोजगार प्राप्त करने की सुविधा मिल सके। बाबा साहेब ने ,’ जाति का विनाश’ नामक पुस्तक का प्रकाशन किया, यह उनका ऐसा भाषण था जो’ जात पात तोड़क मंडल’ की सभा में पढ़ा जाना था लेकिन हिन्दुओं के विरोध के चलते सभा के कार्यक्रम को स्थगित करने के कारण नहीं पढ़ा जा सका था लेकिन इस भाषण ने वर्णव्यवस्था के पोषकों के गुरुर को आयना दिखाने का काम किया था। यही नहीं, बाबा साहेब अंबेडकर ने भारत में ‘बांध तकनीक’ को स्थापित करने में अपनी अहम भूमिका निभाई थी, उन्हीं के योगदान से भारत में बड़े बड़े बांधों का निर्माण हुआ। दामोदर घाटी परियोजना, हीराकुंड, भाखड़ा नांगल बांध, सोन नदी बांध परियोजना आदि का निर्माण हुआ। उन्होंने कानून मंत्री रहते जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने का खुलकर विरोध किया, और अनुच्छेद 370 को गैर जरूरी करार दिया। पिछड़े वर्ग के मसीहा के रूप में पिछड़े वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए प्रयासों के अतिरिक्त उन्होंने महिलाओं के अधिकारों और सम्मान के लिए भी लड़ाई लड़ी। वे 1952 में ‘ हिन्दू कोड बिल’ लेकर आए लेकिन मनुवादियों के विरोध के चलते वह बिल पारित नहीं हो सका। उन्होंने दुःख जताते हुए कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने महिलाओं को शादी से पहले अपनी पैतृक संपत्ति में बराबर का हकदार और शादी के बाद भी उनके संपत्ति के अधिकार को सुनिश्चित करने की कोशिश की। आगे चलकर, ‘हिन्दू मैरिज एक्ट’ के नाम से कुछ संशोधनों के साथ वही बिल पारित हुआ और भारतीय महिलाओं को एक हद तक इससे लाभ मिला।

आदेश संतोषी जी ने बाबासाहेब अंबेडकर जी को महिलाओं का मसीहा बताते हुए कहा कि

डा 0 अंबेडकर ने भारत के वंचित, शोषित वर्ग तथा महिलाओं के उत्थान के लिए और भी कई एक काम किए, ताकि ये लोग सच्ची आज़ादी का अहसास कर सकें। यदि अंबेडकर नहीं होते तो ये सारे काम कौन करता? किस व्यक्ति में इतनी क्षमता थी, जो यह सब कुछ कर पाता? वास्तव में, बाबा साहेब जैसा उच्च शिक्षित विद्वान, कानून का प्रखर वेत्ता और दार्शनिक विद्वान यदि भारत में नहीं हुआ होता, तो इस विश्व प्रसिद्ध संविधान का निर्माण भी नहीं हुआ होता। निश्चित ही बाबा साहेब का जीवन स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर उनके जीवन पर्यन्त तक , देश के लोगों के लिए समर्पित रहा है। सचमुच वे एक युग पुरुष थे।

विश्व प्रताप दिवाकर कानपुर मंडल मीडिया प्रभारी गाडगे यूथ ब्रिगेड ने आज स्वतंत्र भारत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि

आज भारत आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, लेकिन भारतीय समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी आज़ादी के लिए जद्दोजहद कर रहा है। देश में छुआछूत और जातिगत भेदभाव आज भी जस का तस है, मात्र महानगरों में कुछ हद तक अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव से मुक्ति दृष्टिगत होती है। दबंग जातियों की एससी-एसटी विरोधी मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है, वे इन्हें आज भी घृणा की दृष्टि से ही देखते हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से आए दिन एससी-एसटी उत्पीड़न और अत्याचार की घटनाएं घटित होती हैं। इन घटनाओं को रोकने के लिए राज्य सरकारें और केंद्र सरकार कोई कारगर उपाय नहीं कर रही हैं, जिसके परिणामस्वरूप इन घटनाओं पर अंकुश लगाना मुश्किल हो गया है। राजस्थान में कुछ महीनों पहले जितेन्द्र मेघवाल की हत्या मात्र इसलिए की गई थी कि एससी होते हुए उसने मूंछें रखी हुई थीं। 20 जुलाई 2022 को, राजस्थान के जालोर जिले के एक गांव के निजी स्कूल के हैडमास्टर ने अपने ही स्कूल के तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले एक नौ वर्षीय छात्र को बड़ी बेरहमी से इसलिए पीटा कि उसने उस सवर्ण शिक्षक के मटके को हाथ लगाने की जुर्रत की थी। लगभग 25 दिन तक वह बालक अस्पताल में मौत से लड़ता रहा और अंततः उसने दम तोड़ दिया। निश्चित ही यह दिल दहलाने वाली घटना है।

आज़ादी के एक लंबे अरसे के बाद भी इस देश में अस्पृश्यता के खिलाफ सख्त कानून होने के बाबजूद भी अस्पृश्यता खत्म नहीं हो सकी। ‘एससी-एसटी एट्रोसिटी प्रीवेंशन एक्ट’ के होते हुए भी आज भी एससी-एसटी पर अत्याचार और उत्पीड़न में कोई कमी नहीं आई है। ऐसे में इन वर्गों का उत्साह भंग होने के कारण आज़ादी का ‘अमृत महोत्सव’ मनाने का क्या औचित्य रह जाता है। डॉक्टर अंबेडकर के सपनों का भारत एक सपना ही रह गया है। अस्पृश्यता मुक्त और उत्पीड़न विहीन समाज तब तक नहीं बन सकता है, जब तक एससी, एसटी, ओबीसी और धार्मिक अल्पसंख्यक एकजुट होकर मनुवादी ताकतों को परास्त नहीं कर देते।

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